मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

‘ क्योंकी हर एक फ्रैंड ज़रुरी होता है...'


'क्योंकी हर एक फ्रैंड ज़रुरी होता है...' जी हां बिल्कुल सही है हम सभी की ज़िंदगी में हर एक दोस्त की अलग- अलग अहमियत होती है और हर एक हमारे लिए ज़रुरी होता है । हम जब इस दुनिया में आते है उस वक्त हमें पहले से ही लगभग हर रिश्ता बना बनाया मिलता है बस कुछ रिश्ते ही ऐसे होते हैं जो इंसान बाद में वक्त के अनुरुप चुनता है और उनमें से ही एक रिश्ता है दोस्ती का....ये दोस्ती स्कूल से शुरु होती है...जब बचपन में Class में Homework ना करने पर Teacher हमें Punish करती थी तो हमारे हाथों पर Scale के पड़ने वाले निशान का दर्द First Bench पर बैठने वाले हमारे दोस्तों के हाथों में होता था । शाम को साइकिल चलाते वक्त गिरने पर सभी दोस्त घर पर मैरी मम्मी से झूठ बोलते की आंटी बस थोड़ी सी चोट आई है और वो भी रुचि की गलती से नहीं बल्कि वो एक आदमी स्कूटर से आ रहा था उसे ही दिखाई नहीं दिया, ये झूठ इस लिए था की कहीं अगर मम्मी को ये पता चला की गलती मेरी है तो शादत डांट के साथ साथ कल से साइकिल राइड भी बंद हो जाएगी...क्योंकी दोस्ती ही एक ऐसा रिश्ता है जो बिना किसी कॉम्पटीशन के डर से चला जाता है ।Exam में कम Marks आने पर घर में सभी Friends ये बोलते थे की अंकल कितना भी पढ़लो पता नहीं क्यूं ये टीचर्स ऑउट ऑफ सिलेबस QUESTION PAPER बनाते हैं.. इतना ही नहीं ये दोस्ती सिर्फ स्कूल की मस्ती तक ही सीमित नहीं रहती बल्कि कॉलेज में भी इसके कई प्यारे और रंगीन रंग दिखते हैं । बेशक मेरे और मेरी फ्रैंड्स के FIRST CUT OF LIST वाले MARKS आए हों लेकिन हमेने एडमिश्न उसी डफर कॉलेज में लिया जिसमें हमारे दोस्त का एडमिशन हुआ है और हम ने अपने अपने घर पर कहा की आपको नहीं पता डैडी इस कॉलेज का नया (फलां) Course सबसे अच्छा है... ग्रुप स्टडी से लेकर नाइट आउट और Pyjama Party से लेकर कॉलेज की खाली क्लास रुम में जाकर दरवाजा बंदकर पहली बार सिगरेट को डर डर कर हाथ लगाना...सबकुछ दोस्तों के साथ कितना याद आता है... क्साल मेट की Birthday Party में जाकर सभी का एक साथ हल्ला गुल्ला करना और तो और नाइट स्टे करने के नाम पर पहली बार ऑरेंज जूस में थोड़ी वोटका मिलाकर पीना और अपने अपने Boy friend की बाते हों और New Crush के बारे में बताना हो...मानो अब सपना सा लगता है...

वैसे दोस्तों के हसीन किस्सों की फेहरिस्त सिर्फ इतनी ही नहीं है एक किस्सा इतना

दिलचस्प है की आपको बताते वक्त भी... मुझे हंसी आ रही है, दरसल...

एक दिन मैं घर देर से पहुंची तो मम्मी ने पहुंचा - ‘’ कहां थी

मैंने कहा ‘’ फ्रैंड के घर ’’

मम्मी ने मेरे ही सामने मेरे 10 दोस्तों को फोन कर दिया, 4 ने कहा ‘’ हां आंटी यहीं पर थी ’’ , 2 ने कहा ‘’अभी just निकली है

3 ने कहा ‘’ यहीं है आंटी पढ़ रही है फोन दूं क्या ??? ‘’ , और तो और

एक दोस्त ने तो हद ही कर दी बोली ‘’ हां मम्मी बोलिए क्या हुआ है,

बस घर पहुंचने वाली हूं ‘’

बेशक ये दोस्ती की सबसे ख़तरनाक मिसाल थी लेकिन यकीनन ये सब कुछ सिर्फ और सिर्फ दोस्तों और दोस्ती के बीच में ही हो सकता है , कहीं और नहीं । जब भी Office में बॉस से कुछ खिट-पिट हो तो दोस्त ही ऐसे होते हैं जो कहते हैं की छोड़ ना यार टेंशन लेने का नहीं देने का...चल कैंटीन में चलकर चाय पीते हैं और अगर जाने के बाद Canteen बंद हो तो सड़क की चाय से लेकर CCD की कैपिचिनो सबकुछ छान लेना उन लम्हों को चंद अलफाज़ो में फयान कर पाना मेरे लिए मुमकिन नहीं है । जब मंज़ील पाना मुश्किल लगे तो दोस्तों के साथ छत पर जाकर बारिश में भीग कर मस्ती करने में ऐसा ऐहसास होता है की किस चीज़ के लिए हम भाग रहे हैं, कहीं पर कुछ नहीं है अगर कुछ है तो बस दोस्तों के साथ बिताए जाने वाले यही लम्हें जिन्हें हम आज की की Date में काम के चक्कर भूल गए हैं । वैसे हर एक लम्हे की अलग जगह होती है और अहमियत भी....अगर आज ये टेंशन और काम में बिज़ी होने की वजह नहीं होती तो शायद दोस्तों और उनके साथ बिताए वो हसीन पलों की अहमियत भी पता नहीं चलती क्यूंकी इंसान के पास जो भी चीज़ होती है उसकी नज़र में उसकी अहमियत कम ही होती है ।

आज भी जब हम सभी दोस्त मिलते हैं तो हर रोज़ की तरह ये नहीं पूछते की Hello, Hi , How are you??? बल्कि बोलते हैं ओए कैसा है साले / कैसी है, और बता कुछ नया रायता ??? क्यूंकी यही एक मात्र ऐसा रिश्ता है जो ना किसी दिखावे पर टिकता है और ना ही मतलब पर ... तभी तो टेलीकॉम कम्पनी ने भी इसी रिश्ते का इमोश्ल सहारा लेकर हमारी और आपकी जेल ढ़ीली करने का प्रोजेक्ट बनाया था जिसमें वो कामियब भी रहे.... भई इसी लिए को कहते हैं की - चाय के लिए जैसे टोस्ट होता है,

वैसे हर एक फ्रैंड ज़रुरी होता है ।

Ruchi Rai

बुधवार, 7 मार्च 2012

खत्म हुआ यू.पी का महाभारत


उत्तर प्रदेश विधान सभा में ना तो शाही सवारी हाथी तेज़ चल पाई और ना ही
अमूल बेबी कहे जाने वाले राहुल गांधी का जादू...तरक्की हुई तो पर्यावरण
को प्रदूषण से बचाने वाले चुनाव चिन्ह साइकिल की... गांव की पतली और धूलभरी सड़को से लेकर शहरों की चोड़ी सड़को पर चलने वाली साइकिल ने पूरे बहुमत में आकर सभी राजनैतिक दल की नींदें उड़ा दी...साथ ही ये भी बता दिया की अगर जनता अपने पर आए तो किसी को भी सत्ता में लाकर उसके सिर जीत का ताज पहना सकती है , उसकी मर्जी में किसी और की सहायता लेने की ज़रुरत नहीं और ये भी बता दिया की लोगों के झूठे भ्रम और प्रदेश को अपने बाप की बपोती समझने का अधिकार किसी भी सरकार को नहीं है । जनता के समीकरण के आगे सभी दलों के समीकरण फेल हो जाते हैं ।

वैसे देखा जाए तो इस चुनावों के नतीज़ों ने कई लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया है....जीतने वाली पार्टी को भी और हार ने वाली पार्टी को भी...ना तो आज जीत का ताज पहनने वाले अखिलेश यादव को और ना ही रायबरेली और अमेठी जैसे काग्रेंस का गढ़ मानी जाने वाली जगहों पर खड़े हुए प्रतियाशियों को....वैसे इन नतीज़ों से जहां कांग्रेस और बीजेपी को एक बड़ा झटका लगा है तो वहीं एक और इंसान भी है जिसके लिए ये नतीजे किसी लाइफ लाइन के खत्म होने जैसा लगा होगा.....और वो हैं..अमर सिंह...जी हां शायद अमर सिंह को भी इन नतीज़ों की उम्मीद नहीं होगी...जनता ने ये साफ कर दिया की ...अब वो दिन लद गए जब लोग हिरो और हिरोईनों को रैली में देखने जाते थे और उसी के मद्दे नज़र वोट भी डाले जाते थे । जब से अमर सिंह की समाजवादी पार्टी से विदाई होई तब से ना तो किसी फिल्मी सितारे ने पार्टी में अपनी मौजूदगी दर्ज करवाई है और ना ही किसी बड़े उद्योगपत्ति ने, चला तो सिर्फ राज्य के विकास और विद्यार्थियों पर लैपटॉप और टेब्लेट्स का जादू और उसी जादू की बदौलत रातों रात जीत का सेहरा बंध गया अखिलेश यादव के सिर और बन बैठे वे हिरो ।हालांकी अखिलेश के सिर जीत के सेहरे के साथ साथ राज्य की जनता की अब सभी उम्मीदें भी बढ़ गई हैं । ये जीत खुशी के साथ साथ उनके लिए किसी रिएलिटी शो में दिए गए टास्क से कम नहीं होगा...क्योंकी पद जीतने से ज्यादा ज़रुरी होता है उस पद की गरीमा को बनाए रखना ।

देखते हैं मायावती की मूर्तीयों को ना हटाने के फैसले के बाद वाहवाही लूटने वाले अखिलेश क्या आगे भी इसी तरह राज्य के विकास के लिए सही निर्णय लेने में कामियाब होते हैं....क्योंकी अभी सिर्फ जीत हासिल हुई है लोगों का विश्वास जीतना अभी बाकी है ।

मंगलवार, 6 मार्च 2012

दर्द और दौलत की बातचीत


एक दिन दर्द ने दौलत से कहा :- तुम कितनी खुशनसीब हो, की हर कोई तुम्हारे पास आने को कोशिश करता है और मैं कितना बदनसीब की हर कोई मुझसे दूर होना चाहता है...

ये सुनकर दौलत ने दर्द से कहा :- नहीं...खुशनसीब तो तुम हो जिसके पास होने लोग अक्सर अपनों को याद करते हैं, बदनसीब तो मैं हूं जिसके पास होने से लोग अक्सर अपनों को भूल जाते हैं ।


ये मेरी नहीं, किसी और की शायरी की कुछ पंक्तियां हैं, मुझे पसंद आईं तो मैने इसे अपने ब्लॉग पर प्रकाशित कर ली...

शुक्रिया

शुक्रवार, 2 मार्च 2012

देश की असल तस्वीर !


ये है हमारे देश की असल सच्चाई । तस्वीर में साफ है सरकार को अपनी जनता की कितनी परवाह है, सरकार अपना सुख -चैन भूलकर आम जनता के बारे में कितना सोच विचार कर रही है...
जनता की सेवा में लगे राजनेताओं को जनता से इतना वक्त भी नहीं मिलता की वो बेचारे अपने बारे में सोच पाए...देखिए ना इन्हें तो सेवा के आगे अपनी भूख का भी एहसास नहीं हो रहा है और ना ही इनके पास इतना वक्त है की ये बेचारे जनसेवक अपने हाथों से खा भी पाए... जनता को ही इन्हें देखकर याद आता है की इन्हें भूख लगी है, फिर क्या भला नेताजी जनता के आगे से निवाला छीनने से पीछे कैसे रह सकते हैं,कभी निवाला हथिया लिया जाता है तो कभी आंसूओं से आंखे गीली करके अपना लिया जाता है...और वैसे भी बेचारी जनता के पास देने के अलावा कोई दूसरा चारा भी तो नहीं है... उसे देना ज़रुरी है और लेने वाले भी लगभग एक जैसे ही हैं ... अब ऐसी परिस्तिथि में भला वो करे भी तो क्या... अजी यही नहीं... इस लेन देन के चक्कर में नेता जी अगर मुस्कुराकर शुक्रिया भी बोले तो भला हो... अजी वो और उनके लोग तो कभी भी भड़क पड़ते हैं और तो और अपना गुस्सा ज़ाहिर करने के लिए ना जाने कब धमकी दे दें और ना जाने कब हाथों की उंगुलियों का इशारा कर दें , पता ही नहीं चलता की वो कैसे उस उंगुली को लोगों की तरह दिखा सकते हैं जिस उंगली पर लगी स्याही की बदौलत वो और उनके लोग जीत कर आए हैं। कितना अच्छा होता की अगर इस तस्वीर में दोनों बैठे लोगों की जगहें बदल जातीं...काश जन सेवक सच में अपनी जनता का ख्याल रखते...तो कभी सोने की चिड़िया काहा जाने वाला देश सिर्फ कहा नहीं जाता बल्कि सच में एक बार फिर से सोने की चिड़िया ही होता, काश अगर ये तस्वीर बदल जाती तो आज हमारा देश किसी भी बड़े देश से 20 साल पीछे नहीं होता और ना ही हम लोग बचपन से किताबों में देश को विकासशील देश के तौर पर जानते... लेकिन ना जाने ये काश शब्द ही कब बदलेगा ???

बृहस्पतिवार, 1 सितम्बर 2011

जिंदगी का सार



दिल परेशान है, रात भारी है

ज़िंदगी है की फिर भी प्यारी है ।



ये मेरा नहीं किसी और का कहना है पर जिसने भी कहा है बिल्कुल सच कहा है ।




सोमवार, 29 अगस्त 2011

उदास दिल की दास्तां...

आज फिर दिल उदास है , अन बुझी सी प्यास है

मन कहीं लगता नहीं , मानो डूब रहा संसार है


ये इश्क की है कोई नई खासियत , या पुरानी कोई तलाश है

दर ब दर भट रहे हैं , तेरी एक झलक पाने की आस है


बेहरुपिए संसार में बस तेरा ही साथ है ,रंग दे हमें अपने रंग में मिल जाने दे रुह को रुह के पाश में,

क्योंकी

आज दिल बहुत उदास है और अन बुझी सी प्यार है ।



शनिवार, 27 अगस्त 2011

''अन्ना के बहाने लोगों को याद आई मातृ भूमि''

अन्ना के बहाने लोगों को याद आई मातृ भूमि

अन्ना ने भष्ट्राचार के खिलाफ मुहिम क्या शुरु की, हर किसी को मातृ भूमि की याद आ गई नहीं तो पहले देश और भारत माता सिर्फ 26 जनवरी ,15 अगस्त, जैसी दिनों पर ही याद किए जाते थे । पहले सिर्फ इन दिनों पर तिरंगे देखने को मिलते थे और वो सिर्फ एक्के दूक्के...नहीं तो नेट, टीवी या सिर्फ अखबारों में ही तिरंगे की तस्वीर नज़र आती थी और ... लेकिन अन्ना ने अपने जनलोकपाल बिल से वजह से हर किसी को हिन्दुस्तानी होने का दूबारा से एहसास करवाया है... और साथ ही लोगो को ये भी जताने में अपना पूरा सहयोग दिया है की ये देश किसे के बाप की बपौती नहीं है ये देश हमारा है और इसके लिए हमे खुद ही आगे आना होगा...इतना ही नहीं अन्ना के इस आवाहन के बाद हमे देश सिर्फ देशभक्ति के गानों और फिल्मों के ज़रिए ही नहीं बल्कि अनशन से पता लग चुका है और हम सभी की सोती हुई आत्माएं जाग जुकी हैं तो अब अपने देश के लिए जागरुक हो चुकी हैं.. ये अन्ना का ही तो असर है जो अब हर कहीं ट्रकों,बसों, मैट्रो, और तो और सड़कों ,और गलियों में भी ज्यादा से ज्याद लोग हाथों में झंड़ा लिए भारत माता की जय , वन्दे मातरम के नारे लगाते नज़र आ रहे हैं...

जहां इन सब में सभी देशवासियों का सहयोग काबिले तारीफ है तो वहीं दिल्ली वालों की भी तारीफ सबसे ज्यादा होनी चाहिए...मैं ये इस लिए नहीं कह रही हूं की मैं दिल्ली में रहती हूं...बल्कि इस लिए क्योंकी दिल्ली के लिए लोगों की यही छवि रही है की दिल्ली में सभी लोग काफी प्रोफेशनल हैं और यहां लोग सिर्फ अपने काम से काम रखते हैं उनकी नज़र में अगर आप कोई कदम उठाते हैं तो ये आप का अपना व्यक्तिगत सोच ये वो आप से कोई तालुक नहीं रखेंगे ऐसे में दिल्ली में ज्यादा से ज्यादा लोग अपने घरों से निकल कर मैं अन्ना हूं , और अन्ना तुम आगे बढ़ो हम तुम्हारे साथ का नारा लगा रहे हैं और रामलीला मैदान में अपनी एकता का सबूत दे रहे हैं ये अपने आप में बहुत बड़ी बात है ।

ये मातभूमि और देश के लिए प्यार ही तो है जो लोग अपने दफ्तरों से छुट्टी लेकर एकता का सबूत दे रहे हैं और जो लोग दफ्तर से छुट्टी नहीं ले पा रहे हैं वो काम पूरा करेन के बाद वहां हाजिरी दे रहे हैं...कुछ ऐसे ही लोगों से मेरी मुलाकात हुई...वो 10 लोग थे... ये दस के दस लोग अलग अलग कॉल सेंटर कम्पनी में काम करते हैं..जिनकी रात की शिफ्ट होती है जिसे वो पूरा करने के बाद सुबह अन्ना के समर्थन में रामलीला मैदान इक्ठे होते हैं... अब आप इसी क्या कहेंगे...ये अन्ना के जरिए दिलों में देशभक्ति की जलाई जानी वाली उसी आग की लौ है जिसकी वजह से लोग एक होकर देश के लिए कुछ कर गुज़रने की तमन्ना रख रहे हैं । ऐसे एक नहीं कही उदाहरण हैं जिनसे सोए हुए हिन्दुस्तानी के जागने के बारे में बयां करता है...और ये याद दिलाता है की हम हिन्दुस्तानी हैं और ये धरती और ये देश हमारी मां जो त्याग और बलिदान से सीची गई है..जिसके खिलाफ ना तो अब हम कुछ सोचेंगे और ना ही किसी को इसके खिलाफ कुछ करने देंगे ।